सोमवार, 10 मई 2010

संवेदना-शून्य समाज की ओर

कुछ समय पहले मेरे नाना-नानी मुंबई मेरे पास आये हुए थे. मैं उनको घुमाने के लिए अटरिया माल (साउथ मुंबई ) ले कर गया | वहां पर एक घटना घटी, जो मेरे लिए साधारण थी पर नानी जी के लिए असाधारण, मेरे लिए साधारण इसलिए थी क्यूंकि मैं शायद संवेदना हीन समाज का एक हिस्सा बन चुका हूँ या फिर ज्यादा समझदार हो चुका हूँ और समझता हूँ कि कभी कभी संवेदन हीनता भी बरतनी पड़ती है |

घटना
हुआ ये कि जब अटरिया माल मे प्रवेश किया तो guards ने metal-detectar से तलाशी ली, उनका तलाशी लेना मेरे लिए साधारण बात थी, मै समझता हूँ कि लगातार होती घटनाओं को रोकने के लिए इस तरह की भीड़ भरी जगह पर तलाशी लेने मे कोई बुरे नहीं है, पर नानी कैसे समझती, उनके साधारण से मन को यह बिलकुल भी बर्दास्त नहीं हुआ कि कोई उनकी तलाशी ले, ६८  बसंत पार कर चुकी नानी ने दूसरे के सोने को भी मिटटी ही समझा, उनका मन यह कैसे बर्दास्त करता कि कोई उन पर शक करे और तलाशी देने को कहे, छोटे शहरों में किसी की तलाशी लेने का मतलब उसको अपमानित करना होता है, और उनको यह सरासर अपमान लगा, उन्होंने गार्ड से यही कहा कि - 
"लला (बेटा) हम ऐसो कोई काम नाही करत है कि कोई हम पे ऊँगली ओ उठावे "
उनकी बात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम आतंकवाद, अपराध इत्यादि को रोकने के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था कायम कर रहे हैं जो हमें संवेदना शून्य बना रही है ? इस सवाल की तलाश में जब मैंने थोडा सा सोचना प्रारंभ किया तो मैंने पाया कि अगर पिछले 50 सालों पर नज़र डाली जाये तो अब हम लोग पहले के मुकाबले ज्यादा संवेदना-शून्य हो गए हैं.  
मैं अपनी बात को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ -
  • खबरें - आप आज का अखबार खोलिए, उसमे चोरी, बलात्कार, मारपीट इत्यादि दुखद घटनाएं मिलेंगी, पर क्या आप वाकई उन घटनाओं को पढ़ते हैं, और अगर पढ़ते भी है तो क्या अफ़सोस भी करते हैं ? शायद नहीं क्यूंकि यह अब आम बात हो गयी है, आजकल हमारे समाज में चोरी होना, बलात्कार होना आम बात हो गयी है, जैसे यह हमारे जीवन में शामिल ही हो, जब सुबह अखबार खोलते हैं तो हम यह मान कर ही चलते हैं कि इस तरह की घटनाएं तो होंगी ही, और कुछ नयी तरह की खबरों को अखबार में खोजते हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं था, मुझे याद है कि आगरा में जब सुबह-सुबह घर पर अखबार आता था तो इस तरह की खबरों को खास तबज्जो डी जाती थी, इस पर बहस होती थी और बुरे काम करने बालों को कोसा जाता था, पर आज ऐसा नहीं है, हम संवेदना-शून्य समाज की ओर अग्रसर हो रहे हैं.

  • दुर्घटनाएं- मान लीजिये कि आप सड़क पर जा रहे हैं और आपके सामने एक भीड़ लगी हुई है, आप या तो रुकेंगे ही नहीं, और अगर रुकेंगे भी तो किसी से पूछेंगे कि क्या हुआ, जबाब मिलेगा कि दुर्घटना हो गयी है कुछ लोगों को बहुत चोट आई है,  आप अफ़सोस जताएंगे और अपने काम पर चले जायेंगे... क्या पहले ऐसा होता था ?

  • आवाजें - आप घर पर बैठे है, चाय पी रहे है, अचानक आपकी बिल्डिंग के नीचे से ambulance के siren सुनाई देते हैं, क्या आप बहार निकलते हैं, यह देखने के लिए को कहीं आपके पड़ोस की बिल्डिंग में ही आग तो नहीं लग गयी? क्या आपके मन में विचार आता है कि कुछ लोगो को आपकी मदद की जरूरत हो सकती है ?

कहीं ऐसा ना हो कि एक दिन हमारे अंदर की सारी संवेदना समाप्त हो जाये, और हम लोग दूसरों की परवाह करना ही छोड़ दें | हमेशा याद रखिये एक दिन हमको भी किसी की जरूरत पड़ सकती है, और जब हम किसी की मदद नहीं करते तो किसी और से उम्मीद भी नहीं कर सकते |

6 टिप्‍पणियां:

  1. संवेदनाएँ जिंदा रहेगी तभी समाज भी जिंदा रहेगा
    बहुत सही और सार्थक !

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  2. सच है हम संवेदन हीन हो चुके हैं .....कोई फर्क नहीं पड़ता और क्या फर्क पड़ जाएगा जैसे वाक्यांश हमारे मुंह पर आने लगे है .....:-(

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